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Some Mysteries Related To Bhimrao Ramji Ambedkar | भीमराव रामजी अम्बेडकर से संबंधित कुछ रहस्य
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Some Mysteries Related To Bhimrao Ramji Ambedkar | भीमराव रामजी अम्बेडकर से संबंधित कुछ रहस्य

By on April 21, 2018

Some Mysteries Related To Bhimrao Ramji Ambedkar | भीमराव रामजी अम्बेडकर से संबंधित कुछ रहस्य

 

14 अप्रैल, 18 9 1 को,  बाबा साहब के नाम से प्रसिद्ध भीमराव सकपाल का जन्म हुआ था । उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल था और माता का नाम भीमाबाई था। इनके संबंध में एक मिथक ये फैलाया जाता है कि इनके साथ बहुत भेदभाव हुआ । जिससे कि कुपित होकर उन्होंने हिन्दू धर्म छोड़ दिया और बौद्ध धर्म अपना लिया।  आज मैं इनका जीवन परिचय आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ आप स्वयं जान लीजिए कि क्या वास्तव में भेदभाव हुआ।  भीमराव जी का परिवार मूलरूप से मराठी था लेकिन इनके पिता जी श्री रामजी मालोजी सकपाल अंग्रेज सेना में सूबेदार थे । और उनकी तैनाती मध्यप्रदेश(तब मध्य भारत) के महू सैन्य छावनी में थी । इनका जन्म भी यहीं हुआ था । अंग्रेज सेना में उच्च पर आसीन किसी व्यक्ति के पुत्र से भेदभाव हो ऐसा संभव तो नहीं लगता। दूसरी बात प्रसारित होती है कि ये गरीब परिवार से थे तो ये तर्क भी इस आधार पर खारिज हो जाता है क्योंकि इनके पिताजी नौकरी करते थे । लेकिन हाँ ये अपनी पिता जी की 14वीं संतान थे। अब इतने बड़े परिवार को पालना तो इस समय भी मुश्किल है उस वक्त तो परिस्थियां ही विपरीत थीं । अब इस वजह से कोई गरीब है तो आरोप किसी और पर मढ़ना न्यायोचित नहीं है । तीसरी बात कही जाती है कि इनको पढ़ने नहीं दिया गया तो पहली बात यह कि इनके पिता के लिए 14 संतानों को पढ़ा पाना सम्भव ही नहीं रहा होगा। फिर इनकी बौद्धिक क्षमता को देखकर एक ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव अम्बेडकर ने इन्हें प्रारंभिक शिक्षा दिलाई । न केवल शिक्षा दिलाई बल्कि अपना उपनाम भी इन्हें दिया । आगामी शिक्षा दिलाने में कृष्णा महादेव भी सक्षम नहीं थे तो गायकवाड़ शासक जो कि एक क्षत्रिय थें उन्होंने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनको दाखिला दिलाया और उस समय वे इनको 11.50 डॉलर हर महीने खर्च देते थे । अब बात करते हैं उनकी नौकरी की । नवबौद्ध ये आरोप लगाते नहीं थकते कि शूद्रों को नौकरी नहीं दी जाती थी । उनके पिता के नौकरी करने को तो कह दिया जाता है कि वो अंग्रेज सेना में नौकरी करते थे , लेकिन शिक्षा प्राप्त करने के बाद भीमराव ने भी बड़ौदा राज्य में सेना सलाहकार के रूप में नौकरी की थी तो ये आरोप भी खारिज होता है कि रजवाड़ो में नौकरी नहीं दी जाती थी । भीमराव तब के बड़े अंग्रेज नौकरशाहों से परिचय रखते थे । जब एक तरफ देश में स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ रहा था तब भीमराव ने एक अंग्रेज नौकरशाह की पैरवी लेकर मुम्बई के एक अंग्रेज कालेज में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर के रूप में नौकरी जॉइन कर ली । 1920 में कोल्हापुर के महराज के आर्थिक सहयोग से एक बार फिर वे इंग्लैंड गए और डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि प्राप्त की । 1935 में मुम्बई में ला कालेज के प्रधानाचार्य रहे । और वहीं एक बड़ा सा घर बनाकर रहने लगे । इसी साल।1935 में उनकी पत्नी रमाबाई ने देह त्याग दी । पहली बार 13 अक्टूबर 1935 को नासिक में भाषण देते हुए उन्होंने धर्म परिवर्तन की इच्छा प्रकट की थी । और फिर सोच विचार कर ऐसा नहीं किया क्योंकि उस समय उनके साथ हिन्दू धर्म छोड़ने को कोई तैयार नहीं था । फिर उन्होंने दिखाया अपन असली रंग । 20 वर्षों तक लगतार हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए अभियान चलाए रखा । 1936 में अपना राजनीतिक दल बनाया । जिस दल की एक मांग में अलग दलित/मुस्लिम देश की शामिल था जिसे जिन्ना ने बाद में बड़े ही शातिराना ढंग से हाईजैक कर लिया । उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी़ निंदा की। अम्बेडकर रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे। 1941 और 1945 के बीच में उन्होंने बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाशित किये जिनमे ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी शामिल है । हालांकि अम्बेडकर इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी बड़े आलोचक थे। उन्होने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिमों में व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज मे तो हिंदू समाज से भी कहीं अधिक सामाजिक बुराइयां है और मुसलमान उन्हें ” भाईचारे ” जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छुपाते हैं। उन्होंने मुसलमानो द्वारा अर्ज़ल वर्गों के खिलाफ भेदभाव जिन्हें ” निचले दर्जे का ” माना जाता था के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने कहा हालाँकि पर्दा हिंदुओं में भी है पर उसे धार्मिक मान्यता केवल मुसलमानों ने दी है। उन्होंने इस्लाम मे कट्टरता की आलोचना की जिसके कारण इस्लाम की नातियों के अक्षरश: अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है और उसको बदलना बहुत मुश्किल हो गया है। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है। यही कारण था उन्होंने इस्लाम स्वीकार नही किया । हालांकि बहु विवाह के विरोधी थे लेकिन स्वयं ने दो विवाह किए थे । अंग्रेजो और मराठाओं के मध्य हुए युद्ध में अंग्रेजो की तरफ से लड़ने वाले महार जाति के सैनिकों के सम्मान के लिए 1 January 1927  को अम्बेडकर ने कोरेगाँव विजय स्मारक मे एक समारोह आयोजित किया। यहाँ महार समुदाय से संबंधित सैनिकों के नाम संगमरमर के एक शिलालेख पर खुदवाये। गाँधी के स्वतंत्रता आंदोलन के भी वो विरोधी थे। नमक सत्याग्रह का विरोध उन्होंने खुलकर किया था । अम्बेडकर ने कभी किसी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नही लिया । बल्कि मराठाओं के खिलाफ अंग्रेजों की तरफ से लड़ने वालों के सम्मान में समारोह आयोजित किया । 15 अगस्त 1947 में आजादी के बाद उन्हें पहला कानून मंत्री बनाया गया । अब इन्हें मौका मिल गया था धर्म को तोड़ने का और आरक्षण देकर वो जिसमें सफल भी रहे । महात्मा गांधी जाति आधारित आरक्षण के बिल्कुल खिलाफ थे।इसके खिलाफ उन्होंने अनशन भी किया था (अंग्रेज सासन के वक्त जब अम्बेडकर अंग्रेजो से मिलकर इसे लागू करवाना चाहते थे गांधी जेल में थे उन्होंने वहीं आमरण अनशन किया था लेकिन फिर भी अम्बेडकर ही सफल रहे थे )  1952 आम चुनाव और 1953 उपचुनाव भी लड़े लेकिन हार का सामना करना पड़ा । बाद में श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सहयोग से राज्य सभा गए । सन् 1950 के दशक में भीमराव अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका (तब सीलोन) गये। पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए, डॉ॰ अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे।1954 में अम्बेडकर ने म्यामार का दो बार दौरा किया; दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होने ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ या ‘बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया’ की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम महान ग्रंथ, ‘द बुद्ध एंड हिज़ धम्म’ को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात सन 1957 में प्रकाशित हुआ। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया। डॉ॰ अम्बेडकर ने श्रीलंका के एक महान बौद्ध भिक्षु महत्थवीर चंद्रमणी से पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद उन्होने एक अनुमान के अनुसार पहले दिन लगभग 5,00,000 समर्थको को बौद्ध धर्म मे परिवर्तित किया। नवयान लेकर अम्बेडकर और उनके समर्थकों ने हिन्दू धर्म और हिन्दू दर्शन की स्पष्ट निंदा की और उसे त्याग दिया।भीमराव ने दुसरे दिन 15 अक्टूबर को नागपूर में अपने 2,00,000 अनुयायीओं को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी, फिर तीसरे दिन 16 अक्टूबर को भीमराव चंद्रपुर गये और वहां भी उन्होंने 3,00,000 समर्थकों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी। इस तरह केवल तीन दिन में भीमराव ने 10 लाख से अधिक लोगों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित किया। इस घटना से बौद्ध देशों से उन्हें अभिनंदन प्राप्त हुए। इसके बाद वे नेपाल में चौथे विश्व बौद्ध सम्मेलन मे भाग लेने के लिए काठमांडू गये। उन्होंने अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध या कार्ल मार्क्स को 2 दिसंबर 1956 को पूरा किया। जो काम वो 1935 में न कर पाए थे वो 1956 में कर दिखाया। अम्बेडकर ने दीक्षाभूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,14 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित की जो उनकी हिन्दू धर्म के प्रति ईर्ष्या को दिखाती हैं।

22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं :-

मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा।

मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा।

मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा।

मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ।

मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ।

मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा।

मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा।

मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा।

मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ।

मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा।

मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा।

मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा।

मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा।

मैं चोरी नहीं करूँगा।

मैं झूठ नहीं बोलूँगा।

मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा।

मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा।

मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा।

मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ।

मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है।

मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा)।

मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा। अम्बेडकर की मृत्यु को लेकर भारी विवाद है सरकारी रिकॉर्ड में भी कोई कारण दर्ज नही है । कुल मिलाकर अम्बेडकर को जैसा दिखाया जा रहा वैसा बिल्कुल भी नही है । और फिर जिन्हें दलित बताकर आरक्षण दिया जा रहा है उनमें से ज्यादातर तो बौद्ध हैं । वास्तिविक शूद्र तो अभी भी वंचित हैं । भीमराव ने केवल धर्म का नुकसान किया है वो दलितों(नव बौद्धों) के भगवान हैं हिन्दू शूद्रों के नही।

 

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